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अध्याय ४ · 42 श्लोक

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

भगवान बताते हैं कि यह योग पुराना है और धर्म की रक्षा के लिए वे युग-युग में प्रकट होते हैं। कर्म में अकर्म देखना, अनेक प्रकार के यज्ञ और ज्ञान की पवित्रता इस अध्याय के विषय हैं।

यह हिन्दी भावार्थ Bhajan Dhun ने नया लिखा है और विद्वानों द्वारा इसकी समीक्षा अभी जारी है।

  1. 4.1

    श्री भगवानुवाच

    इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
    विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥४.१॥

    श्रीभगवान बोले — यह अविनाशी योग मैंने पहले सूर्यदेव (विवस्वान) को बताया था। सूर्य ने इसे मनु को बताया और मनु ने राजा इक्ष्वाकु को।

  2. 4.2

    एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
    स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥४.२॥

    हे परन्तप! इस तरह परम्परा से चले आ रहे इस योग को राजर्षियों ने जाना। पर बहुत समय बीतने से यह योग इस संसार से लुप्त हो गया।

  3. 4.3

    स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
    भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥४.३॥

    वही पुरातन योग आज मैंने तुम्हें बताया है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो। यह बहुत उत्तम रहस्य है।

  4. 4.4

    अर्जुन उवाच

    अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
    कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४.४॥

    अर्जुन बोले — आपका जन्म तो अभी हाल का है और सूर्यदेव का जन्म बहुत पहले का। फिर मैं कैसे समझूँ कि आपने ही आरम्भ में यह योग उन्हें बताया?

  5. 4.5

    श्री भगवानुवाच

    बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
    तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥४.५॥

    श्रीभगवान बोले — हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। मैं उन सबको जानता हूँ, पर हे परन्तप, तुम नहीं जानते।

  6. 4.6

    अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
    प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥४.६॥

    मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ, सब प्राणियों का ईश्वर हूँ, फिर भी अपनी प्रकृति को वश में रखकर अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।

  7. 4.7

    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥४.७॥

    हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।

  8. 4.8

    परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
    धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥४.८॥

    सज्जनों की रक्षा करने, दुष्कर्म करने वालों का विनाश करने और धर्म को फिर से स्थापित करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

  9. 4.9

    जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
    त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥४.९॥

    हे अर्जुन! जो मेरे जन्म और कर्म को इस तरह दिव्य रूप में तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर छोड़ने के बाद फिर जन्म नहीं लेता, मुझे ही प्राप्त होता है।

  10. 4.10

    वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
    बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥४.१०॥

    राग, भय और क्रोध से मुक्त, मुझमें मन लगाने वाले और मेरी शरण में आए बहुत-से लोग ज्ञान-रूपी तप से पवित्र होकर मेरे भाव को प्राप्त हो चुके हैं।

  11. 4.11

    ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
    मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥४.११॥

    जो मुझे जिस भाव से भजते हैं, मैं भी उन्हें उसी भाव से अपनाता हूँ। हे पार्थ! सभी मनुष्य हर तरह से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

  12. 4.12

    काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
    क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥४.१२॥

    इस संसार में कर्मों का फल चाहने वाले लोग देवताओं की पूजा करते हैं, क्योंकि मनुष्य लोक में कर्म से मिलने वाली सफलता जल्दी मिल जाती है।

  13. 4.13

    चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
    तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥४.१३॥

    गुण और कर्म के आधार पर चारों वर्णों की रचना मैंने की है। उसका कर्ता होते हुए भी मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।

  14. 4.14

    न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
    इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥४.१४॥

    कर्म मुझे नहीं बाँधते और न मुझे कर्मों के फल की इच्छा है। जो मुझे इस तरह जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता।

  15. 4.15

    एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
    कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥४.१५॥

    यह जानकर पहले के मोक्ष चाहने वालों ने भी कर्म किए थे। इसलिए तुम भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाते रहे कर्म ही करो।

  16. 4.16

    किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
    तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥४.१६॥

    कर्म क्या है और अकर्म क्या है — इस विषय में बुद्धिमान भी उलझ जाते हैं। इसलिए मैं तुम्हें कर्म का वह तत्त्व बताऊँगा जिसे जानकर तुम अशुभ (बंधन) से मुक्त हो जाओगे।

  17. 4.17

    कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
    अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥४.१७॥

    कर्म को भी समझना चाहिए, विकर्म (निषिद्ध कर्म) को भी समझना चाहिए और अकर्म को भी समझना चाहिए, क्योंकि कर्म की गति बड़ी गहन है।

  18. 4.18

    कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
    स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥४.१८॥

    जो कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है; वह योगी है और सब कर्म करने वाला है।

  19. 4.19

    यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
    ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥४.१९॥

    जिसके सभी काम कामना और संकल्प से रहित हैं, और जिसके कर्म ज्ञान-रूपी अग्नि में जल गए हैं, उसे ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।

  20. 4.20

    त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
    कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥४.२०॥

    जो कर्मफल की आसक्ति छोड़कर सदा तृप्त है और किसी सहारे पर निर्भर नहीं, वह कर्म में पूरी तरह लगा रहकर भी वास्तव में कुछ नहीं करता (बंधता नहीं)।

  21. 4.21

    निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
    शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥४.२१॥

    जिसने आशा छोड़ दी है, जिसका मन और शरीर वश में है और जिसने सब संग्रह त्याग दिया है, वह केवल शरीर-निर्वाह के कर्म करते हुए पाप का भागी नहीं होता।

  22. 4.22

    यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
    समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥४.२२॥

    जो अपने आप मिलने वाले लाभ से संतुष्ट है, द्वंद्वों से ऊपर है, ईर्ष्या से रहित है और सफलता-असफलता में एक-सा रहता है, वह कर्म करके भी नहीं बँधता।

  23. 4.23

    गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
    यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥४.२३॥

    जिसकी आसक्ति मिट गई है, जो मुक्त है, जिसका मन ज्ञान में स्थित है और जो यज्ञ के लिए कर्म करता है, उसके सारे कर्म पूरी तरह विलीन हो जाते हैं।

  24. 4.24

    ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
    ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥४.२४॥

    अर्पण ब्रह्म है, हवि (आहुति की सामग्री) ब्रह्म है, ब्रह्म-रूपी अग्नि में ब्रह्म-रूपी कर्ता द्वारा आहुति दी जाती है। जो हर कर्म में ब्रह्म को देखता है, वह ब्रह्म को ही पाता है।

  25. 4.25

    दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
    ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥४.२५॥

    कुछ योगी देवताओं के पूजन-रूपी यज्ञ करते हैं, और कुछ ब्रह्म-रूपी अग्नि में यज्ञ के द्वारा ही (स्वयं को) अर्पित करते हैं।

  26. 4.26

    श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
    शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥४.२६॥

    कुछ लोग कान आदि इन्द्रियों को संयम-रूपी अग्नि में होम करते हैं, और कुछ शब्द आदि विषयों को इन्द्रिय-रूपी अग्नि में (मर्यादा से भोगते हुए) होम करते हैं।

  27. 4.27

    सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
    आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥४.२७॥

    कुछ लोग इन्द्रियों और प्राणों की सारी क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म-संयम-योग की अग्नि में होम करते हैं।

  28. 4.28

    द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
    स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥४.२८॥

    कुछ लोग धन के दान से यज्ञ करते हैं, कुछ तप से, कुछ योग से, और कठोर व्रत वाले कुछ साधक स्वाध्याय और ज्ञान से यज्ञ करते हैं।

  29. 4.29

    अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे ।
    प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥४.२९॥

    कुछ लोग प्राण (भीतर जाने वाली साँस) को अपान (बाहर जाने वाली साँस) में और अपान को प्राण में होम करते हैं, और कुछ प्राणायाम में लगे लोग दोनों की गति रोक देते हैं।

  30. 4.30

    अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
    सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥४.३०॥

    कुछ लोग भोजन को नियमित करके प्राणों को प्राणों में होम करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले हैं और यज्ञ से इनके पाप नष्ट हो जाते हैं।

  31. 4.31

    यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
    नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥४.३१॥

    हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ से बचे अमृत (प्रसाद) को ग्रहण करने वाले सनातन ब्रह्म को पाते हैं। जो यज्ञ नहीं करता, उसके लिए यह लोक भी सुखद नहीं, फिर परलोक की तो बात ही क्या।

  32. 4.32

    एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
    कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥४.३२॥

    इस तरह वेद में अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन है। इन सबको कर्म से उत्पन्न जानो; यह जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।

  33. 4.33

    श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
    सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥४.३३॥

    हे परन्तप! धन-सामग्री से होने वाले यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ! सारे कर्म अंत में ज्ञान में ही पूर्ण होते हैं।

  34. 4.34

    तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
    उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥४.३४॥

    उस ज्ञान को तत्त्व जानने वाले ज्ञानियों के पास जाकर समझो — उन्हें प्रणाम करके, सेवा करके और विनम्रता से प्रश्न पूछकर। वे तुम्हें ज्ञान का उपदेश देंगे।

  35. 4.35

    यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
    येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥४.३५॥

    हे पाण्डव! उसे जानकर तुम फिर इस तरह मोह में नहीं पड़ोगे, और उस ज्ञान से सभी प्राणियों को अपने भीतर और फिर मुझमें देखोगे।

  36. 4.36

    अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
    सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥४.३६॥

    यदि तुम सब पापियों से भी बढ़कर पाप करने वाले हो, तब भी ज्ञान-रूपी नाव से सारे पापों के सागर को पार कर जाओगे।

  37. 4.37

    यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
    ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥४.३७॥

    हे अर्जुन! जैसे जलती हुई आग लकड़ियों को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान-रूपी अग्नि सारे कर्मों (के बंधन) को राख कर देती है।

  38. 4.38

    न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
    तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥४.३८॥

    इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है। योग में सिद्ध हुआ व्यक्ति समय आने पर उसे अपने भीतर स्वयं पा लेता है।

  39. 4.39

    श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
    ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥४.३९॥

    श्रद्धावान, उसमें लगा रहने वाला और इन्द्रियों को वश में रखने वाला व्यक्ति ज्ञान पाता है, और ज्ञान पाकर जल्दी ही परम शांति प्राप्त करता है।

  40. 4.40

    अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
    नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥४.४०॥

    जो अज्ञानी है, जिसमें श्रद्धा नहीं और जो संशय से भरा है, उसका पतन होता है। संशय करने वाले के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख।

  41. 4.41

    योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।
    आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥४.४१॥

    हे धनंजय! जिसने योग के द्वारा कर्मों को (भगवान को) अर्पित कर दिया है, जिसके संशय ज्ञान से कट गए हैं और जो आत्मा में स्थित है, उसे कर्म नहीं बाँधते।

  42. 4.42

    तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः ।
    छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥४.४२॥

    इसलिए हे भारत! अज्ञान से पैदा हुए और हृदय में बैठे इस संशय को ज्ञान-रूपी तलवार से काटकर योग में स्थित हो जाओ और (युद्ध के लिए) खड़े हो जाओ।