भगवद्गीता ८.४ Bhagavad Gita 8.4
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥८.४॥
adhibhūtaṃ kṣaro bhāvaḥ puruṣaścādhidaivatam
adhiyajño'hamevātra dehe dehabhṛtāṃ vara
हिन्दी भावार्थ
हे देहधारियों में श्रेष्ठ! नाशवान पदार्थ अधिभूत हैं, विराट पुरुष अधिदैव है, और इस शरीर में मैं ही अधियज्ञ (अंतर्यामी) हूँ।
Bhajan Dhun द्वारा नया लिखा भावार्थ — विद्वानों द्वारा समीक्षा जारी है।
संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता 8.4 (अध्याय 8, अक्षरब्रह्मयोग, श्लोक 4)
