Bhajan Dhun Bhajan Dhun Bhakti. Har Din. Har Ghar.
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अध्याय १८ · 78 श्लोक

मोक्षसंन्यासयोग

संन्यास और त्याग का भेद, कर्म के कारण, और गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, बुद्धि और सुख के प्रकार। अंत में भगवान सब कुछ उन्हें समर्पित करके उनकी शरण आने को कहते हैं, और अर्जुन का मोह दूर हो जाता है।

यह हिन्दी भावार्थ Bhajan Dhun ने नया लिखा है और विद्वानों द्वारा इसकी समीक्षा अभी जारी है।

  1. 18.1

    अर्जुन उवाच

    संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
    त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥१८.१॥

    अर्जुन बोले — हे महाबाहु! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास और त्याग का तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।

  2. 18.2

    श्री भगवानुवाच

    काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
    सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥१८.२॥

    श्रीभगवान बोले — कुछ ज्ञानी कामना से किए जाने वाले कर्मों के त्याग को संन्यास कहते हैं, और विचारशील लोग सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।

  3. 18.3

    त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
    यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥१८.३॥

    कुछ विद्वान कहते हैं कि सब कर्म दोष-युक्त हैं, इसलिए उन्हें छोड़ देना चाहिए; और दूसरे कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप के कर्म नहीं छोड़ने चाहिए।

  4. 18.4

    निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
    त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥१८.४॥

    हे भरतश्रेष्ठ! उस त्याग के विषय में मेरा निश्चित मत सुनो। हे पुरुषसिंह! त्याग तीन प्रकार का बताया गया है।

  5. 18.5

    यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
    यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥१८.५॥

    यज्ञ, दान और तप के कर्म नहीं छोड़ने चाहिए, उन्हें तो करना ही चाहिए, क्योंकि यज्ञ, दान और तप विचारशील लोगों को पवित्र करने वाले हैं।

  6. 18.6

    एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
    कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥१८.६॥

    हे पार्थ! पर ये कर्म भी आसक्ति और फल को छोड़कर करने चाहिए — यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।

  7. 18.7

    नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
    मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥१८.७॥

    नियत (कर्तव्य) कर्म का त्याग उचित नहीं है। मोह के कारण उसका त्याग तामसी त्याग कहा गया है।

  8. 18.8

    दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
    स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥१८.८॥

    जो कर्म को दुख-रूप समझकर शरीर के कष्ट के डर से छोड़ देता है, वह ऐसा राजसी त्याग करके त्याग का फल नहीं पाता।

  9. 18.9

    कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
    सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥१८.९॥

    हे अर्जुन! जो नियत कर्म "यह करना ही चाहिए" समझकर, आसक्ति और फल को छोड़कर किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।

  10. 18.10

    न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
    त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥१८.१०॥

    सत्त्वगुण से युक्त, बुद्धिमान और संशय-रहित त्यागी न अप्रिय कर्म से द्वेष करता है, न प्रिय कर्म में आसक्त होता है।

  11. 18.11

    न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
    यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥१८.११॥

    देहधारी के लिए सब कर्मों को पूरी तरह छोड़ना संभव नहीं है। इसलिए जो कर्मफल का त्याग करता है, वही त्यागी कहलाता है।

  12. 18.12

    अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
    भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥१८.१२॥

    त्याग न करने वालों को मृत्यु के बाद कर्मों का अप्रिय, प्रिय और मिला-जुला — तीन प्रकार का फल मिलता है, पर संन्यासियों (त्यागियों) को कभी नहीं।

  13. 18.13

    पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
    सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥१८.१३॥

    हे महाबाहु! सांख्य-शास्त्र (वेदान्त) में सब कर्मों की सिद्धि के लिए ये पाँच कारण बताए गए हैं, इन्हें मुझसे जानो।

  14. 18.14

    अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
    विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥१८.१४॥

    आधार (शरीर), कर्ता, अलग-अलग इन्द्रियाँ (साधन), अनेक प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ, और पाँचवाँ दैव (भाग्य या ईश्वरीय विधान)।

  15. 18.15

    शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
    न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥१८.१५॥

    मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो भी कर्म आरम्भ करता है — उचित हो या अनुचित — उसके ये पाँच कारण हैं।

  16. 18.16

    तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
    पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥१८.१६॥

    ऐसा होने पर भी जो अधूरी समझ के कारण केवल अपने आप (आत्मा) को कर्ता देखता है, वह दुर्बुद्धि सही नहीं देखता।

  17. 18.17

    यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
    हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥१८.१७॥

    जिसमें "मैं कर्ता हूँ" यह भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सब लोगों को मारकर भी वास्तव में न मारता है, न बँधता है।

  18. 18.18

    ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
    करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥१८.१८॥

    ज्ञान, ज्ञेय (जानने योग्य) और ज्ञाता (जानने वाला) — ये तीन कर्म की प्रेरणा हैं; और साधन, कर्म और कर्ता — ये तीन कर्म के अंग हैं।

  19. 18.19

    ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
    प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥१८.१९॥

    गुणों की गणना करने वाले शास्त्र में ज्ञान, कर्म और कर्ता गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के बताए गए हैं। उन्हें भी ठीक-ठीक सुनो।

  20. 18.20

    सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
    अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥१८.२०॥

    जिस ज्ञान से मनुष्य सब प्राणियों में एक ही अविनाशी सत्ता को, बँटे हुओं में अबँटा देखता है, उस ज्ञान को सात्त्विक जानो।

  21. 18.21

    पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
    वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥१८.२१॥

    जो ज्ञान सब प्राणियों में अलग-अलग प्रकार के अनेक भावों को अलग-अलग जानता है, उसे राजसी ज्ञान जानो।

  22. 18.22

    यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
    अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥१८.२२॥

    जो ज्ञान एक ही काम (या शरीर) को सब कुछ मानकर उसी में आसक्त रहता है, बिना कारण का, बिना सच्चे अर्थ का और तुच्छ है, वह तामसी कहा गया है।

  23. 18.23

    नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
    अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥१८.२३॥

    जो नियत कर्म आसक्ति के बिना, राग-द्वेष के बिना और फल की इच्छा न रखने वाले के द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक कहलाता है।

  24. 18.24

    यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
    क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥१८.२४॥

    पर जो कर्म कामना पूरी करने के लिए या अहंकार के साथ, बहुत परिश्रम से किया जाता है, वह राजसी कहा गया है।

  25. 18.25

    अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
    मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥१८.२५॥

    जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य को देखे बिना केवल मोह से आरम्भ किया जाता है, वह तामसी कहलाता है।

  26. 18.26

    मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
    सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥

    जो आसक्ति-रहित है, "मैं-मैं" नहीं करता, धैर्य और उत्साह से युक्त है और सफलता-असफलता में एक-सा रहता है, वह कर्ता सात्त्विक कहलाता है।

  27. 18.27

    रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
    हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥१८.२७॥

    जो आसक्ति वाला, कर्मफल चाहने वाला, लोभी, दूसरों को कष्ट देने वाला, अशुद्ध और हर्ष-शोक से भरा है, वह कर्ता राजसी कहा गया है।

  28. 18.28

    अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
    विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥१८.२८॥

    जो असंयमी, अशिक्षित (संस्कारहीन), अकड़ू, धूर्त, दूसरों का काम बिगाड़ने वाला, आलसी, उदास रहने वाला और काम को टालने वाला है, वह कर्ता तामसी कहलाता है।

  29. 18.29

    बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु ।
    प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥१८.२९॥

    हे धनंजय! अब गुणों के अनुसार बुद्धि और धृति (धैर्य) के भी तीन-तीन भेद पूरी तरह और अलग-अलग सुनो।

  30. 18.30

    प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
    बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥१८.३०॥

    हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति, कर्तव्य और अकर्तव्य, भय और अभय, बंधन और मोक्ष को ठीक-ठीक जानती है, वह सात्त्विकी है।

  31. 18.31

    यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
    अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥१८.३१॥

    हे पार्थ! जिस बुद्धि से मनुष्य धर्म और अधर्म, कर्तव्य और अकर्तव्य को ठीक से नहीं समझ पाता, वह राजसी है।

  32. 18.32

    अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता ।
    सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥१८.३२॥

    हे पार्थ! अंधकार से ढकी जो बुद्धि अधर्म को धर्म मानती है और सब बातों को उल्टा समझती है, वह तामसी है।

  33. 18.33

    धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
    योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥१८.३३॥

    हे पार्थ! योग से उत्पन्न जिस अटल धृति से मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखता है, वह धृति सात्त्विकी है।

  34. 18.34

    यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
    प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥१८.३४॥

    हे पार्थ अर्जुन! पर जिस धृति से फल चाहने वाला मनुष्य आसक्ति के साथ धर्म, अर्थ और काम को पकड़े रहता है, वह धृति राजसी है।

  35. 18.35

    यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
    न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥१८.३५॥

    हे पार्थ! जिस धृति से दुर्बुद्धि मनुष्य नींद, भय, शोक, उदासी और घमंड को नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है।

  36. 18.36

    सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ ।
    अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥१८.३६॥

    हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार का सुख भी मुझसे सुनो — जिसमें मनुष्य अभ्यास से रमता है और दुखों का अंत पाता है।

  37. 18.37

    यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
    तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥१८.३७॥

    जो शुरू में ज़हर जैसा लगता है पर अंत में अमृत के समान होता है, अपनी बुद्धि की प्रसन्नता (निर्मलता) से उत्पन्न वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

  38. 18.38

    विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
    परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥१८.३८॥

    जो विषयों और इन्द्रियों के मेल से होता है, शुरू में अमृत जैसा लगता है पर अंत में ज़हर जैसा होता है, वह सुख राजसी माना गया है।

  39. 18.39

    यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
    निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥१८.३९॥

    जो सुख शुरू में और बाद में भी अपने को मोहित करने वाला है, और नींद, आलस्य और लापरवाही से उत्पन्न होता है, वह तामसी कहा गया है।

  40. 18.40

    न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
    सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥१८.४०॥

    पृथ्वी पर, स्वर्ग में या देवताओं में भी ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त हो।

  41. 18.41

    ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप ।
    कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥१८.४१॥

    हे परन्तप! ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार बाँटे गए हैं।

  42. 18.42

    शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
    ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥१८.४२॥

    मन का संयम, इन्द्रियों का संयम, तप, पवित्रता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, अनुभव और ईश्वर में आस्था — ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।

  43. 18.43

    शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
    दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥१८.४३॥

    वीरता, तेज, धैर्य, कुशलता, युद्ध से न भागना, दान देना और शासन करने की क्षमता — ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।

  44. 18.44

    कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
    परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥१८.४४॥

    खेती, गौ-पालन और व्यापार वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं, और सेवा करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।

  45. 18.45

    स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
    स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥१८.४५॥

    अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में लगा मनुष्य सिद्धि पाता है। अपने कर्म में लगा व्यक्ति सिद्धि कैसे पाता है, वह सुनो।

  46. 18.46

    यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
    स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥१८.४६॥

    जिससे सब प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सब व्याप्त है, उस परमात्मा की अपने कर्म से पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।

  47. 18.47

    श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
    स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥१८.४७॥

    दूसरे का धर्म भली-भाँति निभाने से अपना धर्म कमियों के साथ निभाना भी श्रेष्ठ है। स्वभाव से निश्चित कर्म करता हुआ मनुष्य पाप नहीं पाता।

  48. 18.48

    सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
    सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥१८.४८॥

    हे कौन्तेय! अपना सहज (स्वाभाविक) कर्म दोष-युक्त हो, तब भी उसे नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि जैसे धुएँ से अग्नि, वैसे ही सब कर्म किसी न किसी दोष से ढके रहते हैं।

  49. 18.49

    असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
    नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥१८.४९॥

    जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्ति-रहित है, जिसने मन को जीत लिया है और जिसकी लालसा मिट गई है, वह संन्यास से नैष्कर्म्य (कर्म-बंधन से मुक्ति) की परम सिद्धि पाता है।

  50. 18.50

    सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
    समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥१८.५०॥

    हे कौन्तेय! सिद्धि पाया हुआ मनुष्य ज्ञान की परम निष्ठा — ब्रह्म — को कैसे पाता है, यह मुझसे संक्षेप में जानो।

  51. 18.51

    बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च ।
    शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥१८.५१॥

    शुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धैर्य से मन को वश में करके, शब्द आदि विषयों को छोड़कर और राग-द्वेष को दूर करके —

  52. 18.52

    विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
    ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥१८.५२॥

    एकांत में रहने वाला, थोड़ा खाने वाला, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला, सदा ध्यान-योग में लगा रहने वाला और वैराग्य का सहारा लेने वाला —

  53. 18.53

    अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
    विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥१८.५३॥

    अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और संग्रह को छोड़कर, ममता-रहित और शांत होकर — वह ब्रह्म से एक होने के योग्य हो जाता है।

  54. 18.54

    ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
    समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥१८.५४॥

    ब्रह्म में स्थित, प्रसन्न मन वाला व्यक्ति न शोक करता है, न कुछ चाहता है। सब प्राणियों में समान भाव रखते हुए वह मेरी परम भक्ति पाता है।

  55. 18.55

    भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
    ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥१८.५५॥

    भक्ति से वह मुझे तत्त्व से जान लेता है कि मैं कौन हूँ और कितना हूँ; और मुझे तत्त्व से जानकर वह तुरंत मुझमें प्रवेश कर जाता है।

  56. 18.56

    सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
    मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥१८.५६॥

    मेरी शरण लेने वाला सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन, अविनाशी पद को पा लेता है।

  57. 18.57

    चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
    बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥१८.५७॥

    मन से सब कर्म मुझे अर्पित करके, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर, बुद्धि-योग का सहारा लेकर सदा मुझमें मन लगाए रहो।

  58. 18.58

    मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
    अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥१८.५८॥

    मुझमें मन लगाने से तुम मेरी कृपा से सब कठिनाइयों को पार कर जाओगे। पर यदि अहंकार के कारण मेरी बात नहीं सुनोगे, तो नष्ट हो जाओगे।

  59. 18.59

    यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
    मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥१८.५९॥

    अहंकार का सहारा लेकर तुम जो सोच रहे हो कि "मैं युद्ध नहीं करूँगा", तुम्हारा यह निश्चय झूठा है; तुम्हारा स्वभाव तुम्हें युद्ध में लगा देगा।

  60. 18.60

    स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
    कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥१८.६०॥

    हे कौन्तेय! मोह के कारण जो काम तुम नहीं करना चाहते, अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म से बँधे होने के कारण वह तुम विवश होकर भी करोगे।

  61. 18.61

    ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
    भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥१८.६१॥

    हे अर्जुन! ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित है, और अपनी माया से सब प्राणियों को ऐसे घुमा रहा है जैसे वे किसी यंत्र पर चढ़े हों।

  62. 18.62

    तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
    तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥१८.६२॥

    हे भारत! पूरे भाव से उसी की शरण में जाओ। उसकी कृपा से तुम परम शांति और सनातन धाम पाओगे।

  63. 18.63

    इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
    विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥१८.६३॥

    इस तरह मैंने तुम्हें गोपनीय से भी अधिक गोपनीय ज्ञान बताया। इस पर पूरी तरह विचार करके जैसा चाहो, वैसा करो।

  64. 18.64

    सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः ।
    इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥१८.६४॥

    सबसे गोपनीय, मेरा परम वचन फिर से सुनो। तुम मुझे बहुत प्रिय हो, इसलिए मैं तुम्हारे हित की बात कहूँगा।

  65. 18.65

    मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
    मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥१८.६५॥

    मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे नमस्कार करो। तुम मुझे ही प्राप्त होगे — यह मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो।

  66. 18.66

    सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
    अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥१८.६६॥

    सब धर्मों (कर्तव्यों के सहारों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।

  67. 18.67

    इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
    न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥१८.६७॥

    यह ज्ञान कभी ऐसे व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए जो तप-रहित हो, भक्ति-रहित हो, सुनना न चाहता हो, या जो मुझमें दोष देखता हो।

  68. 18.68

    य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
    भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥१८.६८॥

    जो इस परम गोपनीय ज्ञान को मेरे भक्तों को बताएगा, वह मेरी परम भक्ति करके निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होगा।

  69. 18.69

    न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
    भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥१८.६९॥

    मनुष्यों में उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं है, और पृथ्वी पर उससे अधिक मुझे प्रिय कोई दूसरा नहीं होगा।

  70. 18.70

    अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
    ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥१८.७०॥

    और जो हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञान-यज्ञ से पूजा जाऊँगा — ऐसा मेरा मत है।

  71. 18.71

    श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः ।
    सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥१८.७१॥

    और जो मनुष्य श्रद्धा के साथ और दोष-दृष्टि के बिना इसे केवल सुनेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्य करने वालों के शुभ लोकों को प्राप्त होगा।

  72. 18.72

    कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
    कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥१८.७२॥

    हे पार्थ! क्या तुमने यह सब एकाग्र मन से सुना? हे धनंजय! क्या तुम्हारा अज्ञान से पैदा हुआ मोह नष्ट हो गया?

  73. 18.73

    अर्जुन उवाच

    नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
    स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥१८.७३॥

    अर्जुन बोले — हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे अपनी स्मृति (सही समझ) फिर मिल गई है। मैं संशय-रहित होकर स्थित हूँ और आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।

  74. 18.74

    सञ्जय उवाच

    इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
    संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥१८.७४॥

    संजय बोले — इस तरह मैंने वासुदेव श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुन का यह अद्भुत और रोमांचित करने वाला संवाद सुना।

  75. 18.75

    व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
    योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥१८.७५॥

    व्यासजी की कृपा से मैंने यह परम गोपनीय योग स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुख से कहते हुए प्रत्यक्ष सुना।

  76. 18.76

    राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
    केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥१८.७६॥

    हे राजन्! केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पवित्र संवाद को बार-बार याद करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।

  77. 18.77

    तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
    विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥१८.७७॥

    हे राजन्! श्रीहरि के उस अत्यंत अद्भुत रूप को भी बार-बार याद करके मुझे बड़ा आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।

  78. 18.78

    यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
    तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥१८.७८॥

    जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहीं लक्ष्मी (समृद्धि), विजय, ऐश्वर्य और अटल नीति है — ऐसा मेरा मत है।