Bhajan Dhun Bhajan Dhun Bhakti. Har Din. Har Ghar.
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अध्याय २ · 72 श्लोक

सांख्ययोग

अर्जुन श्रीकृष्ण की शरण लेता है। भगवान आत्मा की अमरता, अपने कर्तव्य (स्वधर्म), फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करने और स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य (स्थितप्रज्ञ) के लक्षण समझाते हैं। पूरी गीता का सार इस अध्याय में बीज रूप में है।

यह हिन्दी भावार्थ Bhajan Dhun ने नया लिखा है और विद्वानों द्वारा इसकी समीक्षा अभी जारी है।

  1. 2.1

    सञ्जय उवाच

    तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
    विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥२.१॥

    संजय बोले — करुणा से भरे, आँसुओं से भरी व्याकुल आँखों वाले और शोक में डूबे अर्जुन से मधुसूदन श्रीकृष्ण ने यह कहा।

  2. 2.2

    श्री भगवानुवाच

    कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
    अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२.२॥

    श्रीभगवान बोले — हे अर्जुन! इस संकट की घड़ी में तुम्हें यह मोह कहाँ से आ गया? यह श्रेष्ठ लोगों का आचरण नहीं है; यह न स्वर्ग दिलाता है, न यश।

  3. 2.3

    क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
    क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥२.३॥

    हे पार्थ! कायरता को मत अपनाओ, यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हे शत्रुओं को तपाने वाले! मन की इस तुच्छ कमज़ोरी को छोड़कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।

  4. 2.4

    अर्जुन उवाच

    कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
    इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥२.४॥

    अर्जुन बोले — हे मधुसूदन! मैं युद्ध में भीष्म पितामह और गुरु द्रोण पर बाण कैसे चलाऊँ? वे तो मेरे लिए पूजनीय हैं।

  5. 2.5

    गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
    हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥२.५॥

    इन महान गुरुजनों को मारने से तो इस संसार में भीख माँगकर जीना भी अच्छा है। इन्हें मारकर जो धन और सुख मिलेंगे, वे तो खून से सने होंगे।

  6. 2.6

    न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
    यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥२.६॥

    हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या अच्छा है — हम जीतें या वे हमें जीत लें। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वही धृतराष्ट्र के पुत्र सामने खड़े हैं।

  7. 2.7

    कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ।
    यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥२.७॥

    दीनता के दोष ने मेरे स्वभाव को दबा दिया है और धर्म के विषय में मेरी बुद्धि उलझ गई है। जो निश्चित रूप से मेरे लिए कल्याणकारी हो, वह बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ, मुझे शिक्षा दीजिए।

  8. 2.8

    न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
    अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम् राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥२.८॥

    पृथ्वी का निष्कंटक, समृद्ध राज्य या देवताओं का स्वामित्व भी मिल जाए, तब भी मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखा देने वाले इस शोक को दूर कर सके।

  9. 2.9

    सञ्जय उवाच

    एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
    न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥२.९॥

    संजय बोले — हे राजन्! गुडाकेश (नींद को जीतने वाले) अर्जुन श्रीकृष्ण से ऐसा कहकर, "मैं युद्ध नहीं करूँगा" — यह बोलकर चुप हो गए।

  10. 2.10

    तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
    सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥२.१०॥

    हे भारत! तब दोनों सेनाओं के बीच शोक करते हुए अर्जुन से श्रीकृष्ण ने मानो मुस्कुराते हुए ये वचन कहे।

  11. 2.11

    श्री भगवानुवाच

    अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
    गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥२.११॥

    श्रीभगवान बोले — तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं हैं, और साथ ही ज्ञान की बातें भी कर रहे हो। ज्ञानी लोग न मरे हुओं के लिए शोक करते हैं, न जीवितों के लिए।

  12. 2.12

    न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
    न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥२.१२॥

    ऐसा कभी नहीं था कि मैं नहीं था, या तुम नहीं थे, या ये राजा नहीं थे। और ऐसा भी नहीं है कि आगे हम सब नहीं रहेंगे।

  13. 2.13

    देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
    तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥२.१३॥

    जैसे इस शरीर में आत्मा बचपन, जवानी और बुढ़ापा पाती है, वैसे ही मृत्यु के बाद दूसरा शरीर पाती है। धीर व्यक्ति इससे मोहित नहीं होता।

  14. 2.14

    मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
    आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥२.१४॥

    हे कौन्तेय! इन्द्रियों और विषयों के मेल से सर्दी-गर्मी, सुख-दुख होते हैं। ये आते-जाते रहते हैं, स्थायी नहीं हैं। हे भारत! इन्हें धैर्य से सहन करो।

  15. 2.15

    यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
    समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥२.१५॥

    हे पुरुषश्रेष्ठ! जिस धीर व्यक्ति को ये विचलित नहीं करते, जो सुख-दुख में एक-सा रहता है, वही अमरता (मोक्ष) के योग्य होता है।

  16. 2.16

    नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
    उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥२.१६॥

    जो असत् (नश्वर) है उसका स्थायी अस्तित्व नहीं, और जो सत् (सत्य) है उसका कभी अभाव नहीं होता। तत्त्व को जानने वालों ने इन दोनों का सार देखा है।

  17. 2.17

    अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
    विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति ॥२.१७॥

    जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, उसे अविनाशी जानो। इस अविनाशी का नाश कोई नहीं कर सकता।

  18. 2.18

    अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
    अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥२.१८॥

    नित्य, अविनाशी और अपरिमेय आत्मा के ये शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए हे भारत, युद्ध करो।

  19. 2.19

    य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
    उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥२.१९॥

    जो आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है, दोनों ही सच नहीं जानते। आत्मा न किसी को मारती है, न मारी जाती है।

  20. 2.20

    न जायते म्रियते वा कदाचि न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
    अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥२.२०॥

    आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है। यह ऐसा नहीं कि एक बार होकर फिर न रहे। यह अजन्मी, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मरती।

  21. 2.21

    वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
    कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२.२१॥

    हे पार्थ! जो इसे अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह किसी को कैसे मरवा सकता है या किसे मार सकता है?

  22. 2.22

    वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
    तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥२.२२॥

    जैसे मनुष्य पुराने कपड़े उतारकर नए कपड़े पहन लेता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर छोड़कर नए शरीर धारण करती है।

  23. 2.23

    नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
    न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२.२३॥

    इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता और हवा सुखा नहीं सकती।

  24. 2.24

    अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
    नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२.२४॥

    यह आत्मा न कटती है, न जलती है, न गीली होती है, न सूखती है। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।

  25. 2.25

    अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
    तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥२.२५॥

    यह आत्मा इन्द्रियों से दिखाई नहीं देती, मन से सोची नहीं जा सकती और इसमें कोई बदलाव नहीं होता। इसे ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

  26. 2.26

    अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
    तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥२.२६॥

    हे महाबाहु! और यदि तुम इसे बार-बार जन्म लेने और मरने वाला भी मानो, तब भी तुम्हें इस तरह शोक नहीं करना चाहिए।

  27. 2.27

    जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
    तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२.२७॥

    क्योंकि जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरा है उसका जन्म निश्चित है। जो टल ही नहीं सकता, उसके लिए शोक करना उचित नहीं।

  28. 2.28

    अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
    अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥२.२८॥

    हे भारत! सभी प्राणी जन्म से पहले दिखाई नहीं देते, बीच में दिखाई देते हैं, और मृत्यु के बाद फिर अदृश्य हो जाते हैं। फिर इसमें रोना कैसा?

  29. 2.29

    आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
    आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥२.२९॥

    कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, कोई आश्चर्य की तरह इसका वर्णन करता है, कोई आश्चर्य की तरह इसके बारे में सुनता है — और सुनकर भी कोई इसे पूरी तरह नहीं जान पाता।

  30. 2.30

    देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
    तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२.३०॥

    हे भारत! सबके शरीर में रहने वाली यह आत्मा सदा अवध्य है। इसलिए किसी भी प्राणी के लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

  31. 2.31

    स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
    धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥२.३१॥

    अपने स्वधर्म (क्षत्रिय-कर्तव्य) को देखकर भी तुम्हें डगमगाना नहीं चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्म के लिए लड़े जाने वाले युद्ध से बढ़कर कुछ भी कल्याणकारी नहीं है।

  32. 2.32

    यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
    सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥२.३२॥

    हे पार्थ! अपने आप सामने आया ऐसा युद्ध तो स्वर्ग के खुले द्वार जैसा है। ऐसा अवसर भाग्यशाली क्षत्रियों को ही मिलता है।

  33. 2.33

    अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
    ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥२.३३॥

    और यदि तुम यह धर्मयुद्ध नहीं करोगे, तो अपना धर्म और कीर्ति खोकर पाप के भागी बनोगे।

  34. 2.34

    अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
    संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥२.३४॥

    लोग लम्बे समय तक तुम्हारी अपकीर्ति की चर्चा करेंगे, और सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से भी बढ़कर है।

  35. 2.35

    भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
    येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥२.३५॥

    महारथी समझेंगे कि तुम डर के मारे युद्ध से हट गए। जो तुम्हें बहुत मानते थे, उनकी नज़र में तुम छोटे हो जाओगे।

  36. 2.36

    अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
    निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥२.३६॥

    तुम्हारे शत्रु तुम्हारी क्षमता की निंदा करते हुए बहुत-सी न कहने योग्य बातें कहेंगे। इससे बढ़कर दुख और क्या होगा?

  37. 2.37

    हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
    तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥२.३७॥

    युद्ध में मारे गए तो स्वर्ग पाओगे, और जीत गए तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए हे कौन्तेय, निश्चय करके युद्ध के लिए उठो।

  38. 2.38

    सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
    ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥२.३८॥

    सुख-दुख, लाभ-हानि और जीत-हार को समान मानकर युद्ध में लगो। ऐसा करने से तुम्हें पाप नहीं लगेगा।

  39. 2.39

    एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु ।
    बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥२.३९॥

    अब तक मैंने सांख्य (ज्ञान) की दृष्टि से यह बात कही। अब योग (निष्काम कर्म) की बुद्धि के बारे में सुनो, जिससे युक्त होकर तुम कर्म के बंधन से छूट जाओगे।

  40. 2.40

    नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
    स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥२.४०॥

    इस मार्ग में किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता और इसमें उल्टा फल भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी बड़े भय से बचा लेता है।

  41. 2.41

    व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
    बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥२.४१॥

    हे कुरुनन्दन! इस मार्ग पर चलने वालों की बुद्धि एक लक्ष्य पर दृढ़ होती है, पर जो निश्चय नहीं कर पाते, उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं में बँटी और अंतहीन होती है।

  42. 2.42

    यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
    वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥२.४२॥

    हे पार्थ! जो अविवेकी लोग वेदों के कर्मकाण्ड वाले वचनों में ही रमे रहते हैं और कहते हैं कि इसके अलावा कुछ है ही नहीं, वे लुभावनी (फूलों जैसी सजी) बातें करते हैं।

  43. 2.43

    कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
    क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥२.४३॥

    वे कामनाओं से भरे, स्वर्ग को ही सबसे बड़ा लक्ष्य मानने वाले होते हैं, और भोग-ऐश्वर्य पाने के लिए अनेक कर्मकाण्ड बताते हैं, जो फिर से जन्म और कर्मफल ही देते हैं।

  44. 2.44

    भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
    व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥२.४४॥

    जो भोग और ऐश्वर्य में आसक्त हैं और जिनका मन इन बातों से हर लिया गया है, उनकी बुद्धि परमात्मा में स्थिर होकर एकाग्र नहीं हो पाती।

  45. 2.45

    त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
    निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥२.४५॥

    वेदों का बड़ा भाग तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) के विषयों से जुड़ा है। हे अर्जुन! तुम तीनों गुणों से ऊपर उठो, सुख-दुख आदि द्वंद्वों से मुक्त रहो, सदा सत्य में स्थित रहो, कुछ पाने-बचाने की चिंता छोड़ो और आत्मा में टिके रहो।

  46. 2.46

    यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
    तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥२.४६॥

    जैसे चारों ओर पानी से भरे बड़े सरोवर के होते छोटे कुएँ का जितना काम है, उतना ही काम ब्रह्म को जानने वाले के लिए सभी वेदों (के कर्मकाण्ड) का रह जाता है।

  47. 2.47

    कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
    मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥२.४७॥

    तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। इसलिए फल को अपने कर्म का उद्देश्य मत बनाओ, और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

  48. 2.48

    योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
    सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥२.४८॥

    हे धनंजय! आसक्ति छोड़कर, सफलता और असफलता में एक-सा रहकर, योग में स्थित होकर कर्म करो। यही समता योग कहलाती है।

  49. 2.49

    दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
    बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥२.४९॥

    हे धनंजय! बुद्धियोग (समता की बुद्धि) की तुलना में केवल फल के लिए किया गया कर्म बहुत नीचा है। इसलिए इसी बुद्धि की शरण लो; फल के लिए कर्म करने वाले दीन होते हैं।

  50. 2.50

    बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
    तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥२.५०॥

    समता की बुद्धि से युक्त व्यक्ति इसी जीवन में पुण्य और पाप दोनों से ऊपर उठ जाता है। इसलिए योग में लगो — कर्मों में कुशलता ही योग है।

  51. 2.51

    कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
    जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥२.५१॥

    समता की बुद्धि वाले ज्ञानी कर्म से पैदा होने वाले फल को त्यागकर जन्म के बंधन से छूट जाते हैं और उस पद को पाते हैं जहाँ कोई दुख नहीं।

  52. 2.52

    यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
    तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥२.५२॥

    जब तुम्हारी बुद्धि मोह के इस दलदल को पार कर लेगी, तब तुम जो सुन चुके हो और जो आगे सुनोगे, उन सबसे वैराग्य पा लोगे।

  53. 2.53

    श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
    समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥२.५३॥

    अनेक प्रकार की बातें सुनकर भटकी हुई तुम्हारी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर हो जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त होगे।

  54. 2.54

    अर्जुन उवाच

    स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
    स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥२.५४॥

    अर्जुन बोले — हे केशव! जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो समाधि में स्थित है, उस स्थितप्रज्ञ की क्या पहचान है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है?

  55. 2.55

    श्री भगवानुवाच

    प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
    आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥२.५५॥

    श्रीभगवान बोले — हे पार्थ! जब मनुष्य मन की सभी कामनाओं को छोड़ देता है और अपने भीतर, अपनी आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।

  56. 2.56

    दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
    वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥२.५६॥

    जिसका मन दुखों में घबराता नहीं, सुखों की लालसा नहीं करता, और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है, ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि वाला कहलाता है।

  57. 2.57

    यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
    नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२.५७॥

    जो सब जगह आसक्ति से रहित है, और अच्छा या बुरा जो भी मिले उस पर न खुश होता है, न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।

  58. 2.58

    यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
    इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२.५८॥

    जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जो अपनी इन्द्रियों को विषयों से समेट लेता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।

  59. 2.59

    विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
    रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥२.५९॥

    जो विषयों को ग्रहण नहीं करता, उससे विषय तो दूर हो जाते हैं, पर उनका स्वाद (भीतर की ललक) बना रहता है। परमात्मा का अनुभव होने पर वह ललक भी मिट जाती है।

  60. 2.60

    यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
    इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥२.६०॥

    हे कौन्तेय! प्रयत्न करने वाले बुद्धिमान व्यक्ति के मन को भी ये बलवान इन्द्रियाँ ज़बरदस्ती खींच ले जाती हैं।

  61. 2.61

    तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
    वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२.६१॥

    इसलिए उन सब इन्द्रियों को वश में करके, मुझमें मन लगाकर, एकाग्र होकर बैठे। जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसी की बुद्धि स्थिर होती है।

  62. 2.62

    ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
    सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥२.६२॥

    विषयों के बारे में सोचते रहने से उनमें आसक्ति पैदा होती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है, और कामना (पूरी न होने) से क्रोध पैदा होता है।

  63. 2.63

    क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
    स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥२.६३॥

    क्रोध से मूढ़ता आती है, मूढ़ता से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति के भ्रम से बुद्धि नष्ट होती है, और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।

  64. 2.64

    रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
    आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥२.६४॥

    पर जिसका मन वश में है, वह राग-द्वेष से रहित और अपने वश में की हुई इन्द्रियों से विषयों का व्यवहार करते हुए भी भीतर की प्रसन्नता (शांति) पाता है।

  65. 2.65

    प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
    प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥२.६५॥

    उस प्रसन्नता के आने पर उसके सारे दुख मिट जाते हैं, और प्रसन्न मन वाले की बुद्धि जल्दी ही स्थिर हो जाती है।

  66. 2.66

    नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
    न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥२.६६॥

    जिसका मन वश में नहीं, उसकी बुद्धि स्थिर नहीं होती और उसमें परमात्मा का भाव भी नहीं जागता। भाव के बिना शांति नहीं, और अशांत व्यक्ति को सुख कहाँ?

  67. 2.67

    इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
    तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥२.६७॥

    जैसे जल में चलती नाव को हवा बहा ले जाती है, वैसे ही विषयों में भटकती इन्द्रियों में से जिसके पीछे मन लग जाता है, वह एक इन्द्रिय ही बुद्धि को बहा ले जाती है।

  68. 2.68

    तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
    इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२.६८॥

    इसलिए हे महाबाहु! जिसकी इन्द्रियाँ विषयों से पूरी तरह रोक ली गई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है।

  69. 2.69

    या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
    यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥२.६९॥

    जो सब प्राणियों के लिए रात है (परमात्मा का ज्ञान), उसमें संयमी जागता है; और जिसमें सब प्राणी जागते हैं (भोग-विषय), वह तत्त्व को देखने वाले मुनि के लिए रात है।

  70. 2.70

    आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
    तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥२.७०॥

    जैसे सब ओर से भरता हुआ, फिर भी अपनी मर्यादा में अचल रहने वाला समुद्र नदियों के जल को अपने में समा लेता है, वैसे ही जिसमें सभी कामनाएँ बिना हलचल के समा जाती हैं, वही शांति पाता है — भोगों की कामना करने वाला नहीं।

  71. 2.71

    विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
    निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति ॥२.७१॥

    जो मनुष्य सब कामनाओं को छोड़कर, लालसा, ममता और अहंकार से रहित होकर विचरता है, वही शांति पाता है।

  72. 2.72

    एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
    स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥२.७२॥

    हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति (ब्रह्म में स्थित अवस्था) है। इसे पाकर मनुष्य फिर मोहित नहीं होता, और अंत समय में भी इसमें स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (परम शांति) पा लेता है।