Bhajan Dhun Bhajan Dhun Bhakti. Har Din. Har Ghar.
Sign In

अध्याय ११ · 55 श्लोक

विश्वरूपदर्शनयोग

अर्जुन की प्रार्थना पर भगवान दिव्य दृष्टि देकर अपना विराट रूप दिखाते हैं। अर्जुन भय और श्रद्धा से स्तुति करता है, फिर भगवान अपना सौम्य रूप फिर से धारण करते हैं।

यह हिन्दी भावार्थ Bhajan Dhun ने नया लिखा है और विद्वानों द्वारा इसकी समीक्षा अभी जारी है।

  1. 11.1

    अर्जुन उवाच

    मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
    यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥११.१॥

    अर्जुन बोले — मुझ पर कृपा करके आपने अध्यात्म नाम का जो परम गोपनीय उपदेश दिया, उससे मेरा यह मोह दूर हो गया है।

  2. 11.2

    भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
    त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥११.२॥

    हे कमलनयन! मैंने आपसे प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय के बारे में विस्तार से सुना है, और आपकी अविनाशी महिमा भी।

  3. 11.3

    एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
    द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥११.३॥

    हे परमेश्वर! आप अपने बारे में जैसा कहते हैं, वैसा ही है। पर हे पुरुषोत्तम! मैं आपके उस ईश्वरीय रूप को देखना चाहता हूँ।

  4. 11.4

    मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
    योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम् ॥११.४॥

    हे प्रभो! यदि आप मानते हैं कि मैं उसे देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर, मुझे अपना वह अविनाशी स्वरूप दिखाइए।

  5. 11.5

    श्री भगवानुवाच

    पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
    नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥११.५॥

    श्रीभगवान बोले — हे पार्थ! मेरे सैकड़ों और हज़ारों अलग-अलग प्रकार के, अनेक रंगों और आकारों वाले दिव्य रूपों को देखो।

  6. 11.6

    पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
    बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याऽश्चर्याणि भारत ॥११.६॥

    हे भारत! आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, दोनों अश्विनी कुमारों और मरुतों को देखो, और पहले कभी न देखे गए बहुत-से आश्चर्यों को देखो।

  7. 11.7

    इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
    मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥११.७॥

    हे गुडाकेश! आज मेरे इस शरीर में एक जगह स्थित चर-अचर सहित पूरे जगत को देखो, और जो कुछ भी तुम देखना चाहते हो, वह भी।

  8. 11.8

    न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
    दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥११.८॥

    पर तुम अपनी इन आँखों से मुझे नहीं देख सकते। इसलिए मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ — मेरी ईश्वरीय योग-शक्ति को देखो।

  9. 11.9

    सञ्जय उवाच

    एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
    दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥११.९॥

    संजय बोले — हे राजन्! ऐसा कहकर महान योगेश्वर श्रीहरि ने अर्जुन को अपना परम ईश्वरीय रूप दिखाया।

  10. 11.10

    अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
    अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥११.१०॥

    उस रूप में अनेक मुख और आँखें थीं, अनेक अद्भुत दृश्य थे, अनेक दिव्य आभूषण थे और अनेक दिव्य शस्त्र उठे हुए थे।

  11. 11.11

    दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
    सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥११.११॥

    वे दिव्य मालाएँ और वस्त्र धारण किए हुए थे, दिव्य सुगंध का लेप लगाए थे। वह रूप सब आश्चर्यों से भरा, अनंत और सब ओर मुख वाला था।

  12. 11.12

    दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
    यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥११.१२॥

    यदि आकाश में एक साथ हज़ार सूर्य उदय हो जाएँ, तो शायद उनका प्रकाश उस महात्मा के प्रकाश के समान हो।

  13. 11.13

    तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
    अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥११.१३॥

    तब अर्जुन ने देवों के देव के उस शरीर में अनेक भागों में बँटे हुए पूरे जगत को एक ही जगह स्थित देखा।

  14. 11.14

    ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
    प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥११.१४॥

    तब आश्चर्य से भरे, रोमांचित अर्जुन ने भगवान को सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा।

  15. 11.15

    अर्जुन उवाच

    पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
    ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥११.१५॥

    अर्जुन बोले — हे देव! मैं आपके शरीर में सब देवताओं को, अनेक प्रकार के प्राणियों के समूहों को, कमल के आसन पर बैठे ब्रह्मा को, शिव को, सब ऋषियों को और दिव्य नागों को देख रहा हूँ।

  16. 11.16

    अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
    नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥११.१६॥

    हे विश्वेश्वर! हे विश्वरूप! मैं आपको अनेक भुजाओं, पेटों, मुखों और आँखों वाला, सब ओर अनंत रूपों वाला देख रहा हूँ। मुझे आपका न अंत दिखता है, न मध्य, न आदि।

  17. 11.17

    किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम् ।
    पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥११.१७॥

    मैं आपको मुकुट, गदा और चक्र धारण किए, तेज के पुंज, सब ओर से चमकते हुए, जलती आग और सूर्य जैसी ज्योति वाले, कठिनाई से देखे जा सकने वाले और अपार रूप में देख रहा हूँ।

  18. 11.18

    त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
    त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥११.१८॥

    आप ही जानने योग्य परम अक्षर हैं, आप ही इस विश्व के परम आधार हैं। आप अविनाशी हैं, सनातन धर्म के रक्षक हैं, और मेरे मत में आप ही सनातन पुरुष हैं।

  19. 11.19

    अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
    पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम् स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥११.१९॥

    मैं आपको आदि, मध्य और अंत से रहित, अनंत शक्ति वाले, अनंत भुजाओं वाले, चंद्र और सूर्य-रूपी आँखों वाले, जलती अग्नि जैसे मुख वाले और अपने तेज से इस विश्व को तपाते हुए देख रहा हूँ।

  20. 11.20

    द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
    दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥११.२०॥

    हे महात्मन्! आकाश और पृथ्वी के बीच का यह सारा स्थान और सब दिशाएँ अकेले आपसे ही भरी हुई हैं। आपके इस अद्भुत और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक काँप रहे हैं।

  21. 11.21

    अमी हि त्वां सुरसङ्घाः विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
    स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥११.२१॥

    देवताओं के ये समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं, कुछ डरकर हाथ जोड़े आपकी स्तुति कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धों के समूह "कल्याण हो" कहकर अनेक स्तोत्रों से आपकी स्तुति कर रहे हैं।

  22. 11.22

    रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
    गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥११.२२॥

    रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनी कुमार, मरुत, पितर, और गन्धर्वों, यक्षों, असुरों और सिद्धों के समूह — सभी आश्चर्य से आपको देख रहे हैं।

  23. 11.23

    रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
    बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम् ॥११.२३॥

    हे महाबाहु! अनेक मुखों और आँखों वाले, अनेक भुजाओं, जाँघों और पैरों वाले, अनेक पेटों वाले और अनेक भयंकर दाढ़ों वाले आपके इस विशाल रूप को देखकर सब लोक व्याकुल हैं, और मैं भी।

  24. 11.24

    नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
    दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥११.२४॥

    हे विष्णो! आकाश को छूते, अनेक रंगों से चमकते, खुले मुखों और चमकती विशाल आँखों वाले आपको देखकर मेरा मन भीतर से काँप रहा है; मुझे न धैर्य मिल रहा है, न शांति।

  25. 11.25

    दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
    दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥११.२५॥

    भयंकर दाढ़ों वाले और प्रलय की अग्नि जैसे आपके मुखों को देखकर मुझे दिशाओं का ज्ञान नहीं रहा और न सुख मिल रहा है। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए।

  26. 11.26

    अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।
    भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथाऽसौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥११.२६॥

    धृतराष्ट्र के ये सब पुत्र राजाओं के समूहों सहित, भीष्म, द्रोण और सूतपुत्र कर्ण, हमारी ओर के प्रमुख योद्धाओं सहित —

  27. 11.27

    वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
    केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥११.२७॥

    बड़ी तेज़ी से आपके भयंकर दाढ़ों वाले डरावने मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। कुछ के सिर चूर-चूर होकर दाँतों के बीच फँसे दिखाई दे रहे हैं।

  28. 11.28

    यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखाः द्रवन्ति ।
    तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥११.२८॥

    जैसे नदियों की अनेक धाराएँ समुद्र की ओर ही दौड़ती हैं, वैसे ही मनुष्य-लोक के ये वीर आपके जलते मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

  29. 11.29

    यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
    तथैव नाशाय विशन्ति लोका स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥११.२९॥

    जैसे पतंगे नष्ट होने के लिए तेज़ी से जलती आग में घुसते हैं, वैसे ही ये लोग भी नष्ट होने के लिए तेज़ी से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

  30. 11.30

    लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
    तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥११.३०॥

    हे विष्णो! आप अपने जलते मुखों से सब लोकों को सब ओर से निगलते हुए चाट रहे हैं। आपका उग्र प्रकाश पूरे जगत को तेज से भरकर तपा रहा है।

  31. 11.31

    आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
    विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥११.३१॥

    मुझे बताइए कि उग्र रूप वाले आप कौन हैं? हे देवश्रेष्ठ! आपको नमस्कार है, प्रसन्न होइए। मैं आदि पुरुष आपको जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपका प्रयोजन नहीं समझ पा रहा।

  32. 11.32

    श्री भगवानुवाच

    कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
    ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥११.३२॥

    श्रीभगवान बोले — मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय लोकों का संहार करने में लगा हूँ। तुम्हारे बिना भी विरोधी सेनाओं में खड़े ये सब योद्धा नहीं बचेंगे।

  33. 11.33

    तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
    मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥११.३३॥

    इसलिए तुम उठो और यश पाओ। शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य भोगो। ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं; हे सव्यसाची (दोनों हाथों से बाण चलाने वाले), तुम केवल निमित्त बनो।

  34. 11.34

    द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् ।
    मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥११.३४॥

    द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और दूसरे वीर योद्धाओं को, जो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं, तुम मारो। व्याकुल मत हो, युद्ध करो — तुम युद्ध में शत्रुओं को जीतोगे।

  35. 11.35

    सञ्जय उवाच

    एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
    नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥११.३५॥

    संजय बोले — केशव के ये वचन सुनकर मुकुटधारी अर्जुन काँपते हुए, हाथ जोड़कर, नमस्कार करके, बहुत डरे हुए और गद्गद वाणी से फिर प्रणाम करके श्रीकृष्ण से बोले।

  36. 11.36

    अर्जुन उवाच

    स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
    रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥११.३६॥

    अर्जुन बोले — हे हृषीकेश! यह उचित ही है कि आपकी कीर्ति से जगत प्रसन्न होता है और प्रेम करता है, डरे हुए राक्षस सब दिशाओं में भागते हैं और सिद्धों के समूह आपको नमस्कार करते हैं।

  37. 11.37

    कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
    अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥११.३७॥

    हे महात्मन्! वे आपको नमस्कार क्यों न करें, आप तो ब्रह्मा से भी बड़े और उनके भी आदि कर्ता हैं। हे अनंत! हे देवेश! हे जगन्निवास! आप सत्, असत् और उनसे भी परे अक्षर हैं।

  38. 11.38

    त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
    वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥११.३८॥

    आप आदि देव और सनातन पुरुष हैं, आप इस जगत के परम आधार हैं। आप जानने वाले भी हैं, जानने योग्य भी और परम धाम भी। हे अनंत रूप! यह जगत आपसे व्याप्त है।

  39. 11.39

    वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
    नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥११.३९॥

    आप ही वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्रमा, प्रजापति और प्रपितामह (ब्रह्मा के भी पिता) हैं। आपको हज़ारों बार नमस्कार है, फिर-फिर नमस्कार है।

  40. 11.40

    नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
    अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥११.४०॥

    हे सर्वरूप! आपको आगे से, पीछे से और सब ओर से नमस्कार है। आप अनंत शक्ति और अपार पराक्रम वाले हैं; आप सबमें व्याप्त हैं, इसलिए आप ही सब कुछ हैं।

  41. 11.41

    सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
    अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥११.४१॥

    आपकी इस महिमा को न जानते हुए, आपको मित्र मानकर मैंने भूल से या प्रेम से जो "हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा" कहकर बिना सोचे पुकारा —

  42. 11.42

    यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
    एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥११.४२॥

    और हे अच्युत! हँसी-मज़ाक में घूमते, सोते, बैठते या खाते समय, अकेले में या दूसरों के सामने आपका जो अपमान हुआ, उन सबके लिए मैं अपार प्रभाव वाले आपसे क्षमा माँगता हूँ।

  43. 11.43

    पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
    न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥११.४३॥

    आप इस चर-अचर जगत के पिता हैं, पूजनीय हैं और सबसे बड़े गुरु हैं। हे अतुलनीय प्रभाव वाले! तीनों लोकों में आपके समान भी कोई नहीं, फिर आपसे बढ़कर कैसे होगा?

  44. 11.44

    तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
    पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥११.४४॥

    इसलिए मैं शरीर को झुकाकर प्रणाम करके, स्तुति के योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न करना चाहता हूँ। हे देव! जैसे पिता पुत्र को, मित्र मित्र को और प्रिय अपने प्रिय को सह लेता है, वैसे ही आप मुझे क्षमा करें।

  45. 11.45

    अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
    तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥११.४५॥

    पहले कभी न देखे गए इस रूप को देखकर मैं प्रसन्न भी हूँ, पर मेरा मन भय से व्याकुल भी है। हे देव! मुझे वही (सौम्य) रूप दिखाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए।

  46. 11.46

    किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
    तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥११.४६॥

    मैं आपको वैसे ही मुकुट पहने, गदा और चक्र हाथ में लिए देखना चाहता हूँ। हे सहस्रबाहु! हे विश्वमूर्ति! आप उसी चतुर्भुज रूप में प्रकट होइए।

  47. 11.47

    श्री भगवानुवाच

    मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
    तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥११.४७॥

    श्रीभगवान बोले — हे अर्जुन! मैंने प्रसन्न होकर अपनी योग-शक्ति से तुम्हें यह तेजोमय, अनंत, आदि और परम विश्वरूप दिखाया है, जिसे तुम्हारे अलावा पहले किसी ने नहीं देखा।

  48. 11.48

    न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
    एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥११.४८॥

    हे कुरुवीर! मनुष्य-लोक में न वेदों के अध्ययन से, न यज्ञों से, न दान से, न कर्मकाण्ड से और न कठोर तपों से — तुम्हारे अलावा कोई मुझे इस रूप में देख सकता है।

  49. 11.49

    मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
    व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥११.४९॥

    मेरे इस भयंकर रूप को देखकर तुम व्याकुल और मोहित मत हो। भय छोड़कर, प्रसन्न मन से फिर मेरे उसी रूप को देखो।

  50. 11.50

    सञ्जय उवाच

    इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
    आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥११.५०॥

    संजय बोले — वासुदेव ने अर्जुन से ऐसा कहकर फिर अपना (चतुर्भुज) रूप दिखाया, और फिर सौम्य मनुष्य-रूप धारण करके महात्मा श्रीकृष्ण ने डरे हुए अर्जुन को धीरज बँधाया।

  51. 11.51

    अर्जुन उवाच

    दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
    इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥११.५१॥

    अर्जुन बोले — हे जनार्दन! आपका यह सौम्य मनुष्य-रूप देखकर अब मैं शांत मन वाला होकर अपनी स्वाभाविक अवस्था में आ गया हूँ।

  52. 11.52

    श्री भगवानुवाच

    सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
    देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥११.५२॥

    श्रीभगवान बोले — मेरा यह रूप, जो तुमने देखा है, देखना बहुत कठिन है। देवता भी इस रूप के दर्शन के लिए सदा लालायित रहते हैं।

  53. 11.53

    नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
    शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥११.५३॥

    जिस रूप में तुमने मुझे देखा है, उस रूप में न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से मुझे देखा जा सकता है।

  54. 11.54

    भक्त्या त्वनन्यया शक्यमहमेवंविधोऽर्जुन ।
    ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥११.५४॥

    पर हे परन्तप अर्जुन! अनन्य भक्ति से ही मुझे इस रूप में तत्त्व से जाना, देखा और मुझमें प्रवेश किया जा सकता है।

  55. 11.55

    मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
    निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥११.५५॥

    हे पाण्डव! जो मेरे लिए कर्म करता है, मुझे ही परम लक्ष्य मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति से रहित है और किसी प्राणी से वैर नहीं रखता, वह मुझे प्राप्त होता है।