अध्याय १४ · 27 श्लोक
गुणत्रयविभागयोग
सत्त्व, रज और तम — ये तीन गुण मनुष्य को बाँधते हैं। उनके लक्षण, उनका फल, और गुणों से ऊपर उठे हुए व्यक्ति (गुणातीत) की पहचान।
यह हिन्दी भावार्थ Bhajan Dhun ने नया लिखा है और विद्वानों द्वारा इसकी समीक्षा अभी जारी है।
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14.1
श्री भगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥१४.१॥श्रीभगवान बोले — सब ज्ञानों में उत्तम वह परम ज्ञान मैं फिर से कहूँगा, जिसे जानकर सब मुनि इस संसार से परम सिद्धि को प्राप्त हुए।
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14.2
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥१४.२॥इस ज्ञान का सहारा लेकर जो मेरे स्वरूप को प्राप्त हो गए हैं, वे न सृष्टि के समय जन्म लेते हैं और न प्रलय के समय व्याकुल होते हैं।
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14.3
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥१४.३॥हे भारत! महत्-ब्रह्म (मूल प्रकृति) मेरी योनि (गर्भ-स्थान) है, उसमें मैं (चेतना-रूपी) बीज रखता हूँ। उससे सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
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14.4
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥१४.४॥हे कौन्तेय! सब योनियों में जो भी शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी माता महत्-ब्रह्म (प्रकृति) है और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।
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14.5
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥१४.५॥हे महाबाहु! सत्त्व, रज और तम — प्रकृति से उत्पन्न ये तीन गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं।
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14.6
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥१४.६॥हे निष्पाप! इनमें सत्त्वगुण निर्मल होने के कारण प्रकाश देने वाला और विकार-रहित है; वह सुख की आसक्ति और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।
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14.7
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥१४.७॥हे कौन्तेय! रजोगुण को राग (लगाव) से भरा, तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न जानो। वह जीवात्मा को कर्मों की आसक्ति से बाँधता है।
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14.8
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥१४.८॥हे भारत! तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न और सब देहधारियों को मोहित करने वाला जानो। वह लापरवाही, आलस्य और नींद से बाँधता है।
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14.9
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥१४.९॥हे भारत! सत्त्वगुण सुख में लगाता है, रजोगुण कर्म में लगाता है, और तमोगुण ज्ञान को ढककर लापरवाही में लगाता है।
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14.10
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥१४.१०॥हे भारत! रज और तम को दबाकर सत्त्व बढ़ता है, सत्त्व और तम को दबाकर रज, और सत्त्व और रज को दबाकर तम बढ़ता है।
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14.11
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥१४.११॥जब इस शरीर के सब द्वारों (इन्द्रियों) में ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है, तब जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।
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14.12
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥१४.१२॥हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण बढ़ने पर लोभ, कामों में लगे रहना, नए-नए काम शुरू करना, बेचैनी और लालसा उत्पन्न होते हैं।
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14.13
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥१४.१३॥हे कुरुनन्दन! तमोगुण बढ़ने पर अंधकार (विवेक की कमी), काम में अरुचि, लापरवाही और मोह उत्पन्न होते हैं।
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14.14
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥१४.१४॥जब सत्त्वगुण बढ़ा हुआ हो और तब देहधारी की मृत्यु हो, तो वह उत्तम ज्ञानियों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है।
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14.15
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥१४.१५॥रजोगुण में मृत्यु होने पर वह कर्मों में आसक्त लोगों में जन्म लेता है, और तमोगुण में मृत्यु होने पर मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।
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14.16
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥१४.१६॥अच्छे कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल कहा गया है, रजोगुण का फल दुख है, और तमोगुण का फल अज्ञान है।
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14.17
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥१४.१७॥सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है, रज से लोभ, और तम से लापरवाही, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं।
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14.18
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥१४.१८॥सत्त्वगुण में स्थित लोग ऊपर (उच्च लोकों में) जाते हैं, रजोगुण वाले बीच में (मनुष्य-लोक में) रहते हैं, और नीच गुण तमोगुण में स्थित लोग नीचे जाते हैं।
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14.19
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥१४.१९॥जब देखने वाला (साक्षी) गुणों के अलावा किसी को कर्ता नहीं देखता और गुणों से परे परमात्मा को जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
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14.20
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥१४.२०॥शरीर की उत्पत्ति के कारण इन तीनों गुणों को पार करके देहधारी जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुखों से मुक्त होकर अमरता पाता है।
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14.21
अर्जुन उवाच
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥१४.२१॥अर्जुन बोले — हे प्रभो! इन तीनों गुणों से परे हुए व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं? उसका आचरण कैसा होता है? और वह इन तीनों गुणों को कैसे पार करता है?
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14.22
श्री भगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥१४.२२॥श्रीभगवान बोले — हे पाण्डव! प्रकाश (सत्त्व), कर्म में प्रवृत्ति (रज) और मोह (तम) — जब ये आते हैं तो वह इनसे द्वेष नहीं करता, और जब ये चले जाते हैं तो इनकी इच्छा नहीं करता।
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14.23
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥१४.२३॥जो उदासीन (तटस्थ) की तरह स्थित रहता है, गुणों से विचलित नहीं होता, और "गुण ही गुणों में बरत रहे हैं" यह समझकर स्थिर रहता है और डगमगाता नहीं —
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14.24
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥१४.२४॥जो सुख-दुख में समान है, अपने स्वरूप में स्थित है, मिट्टी, पत्थर और सोने को समान देखता है, प्रिय-अप्रिय को समान मानता है, धीर है, और अपनी निंदा और प्रशंसा को समान समझता है —
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14.25
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥१४.२५॥जो मान और अपमान में समान है, मित्र और शत्रु के पक्ष में समान है, और जिसने सब (स्वार्थ भरे) कामों की शुरुआत छोड़ दी है — वह गुणातीत कहलाता है।
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14.26
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥१४.२६॥जो अटल भक्ति-योग से मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पार करके ब्रह्म को प्राप्त होने के योग्य हो जाता है।
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14.27
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥१४.२७॥क्योंकि उस अविनाशी ब्रह्म का, अमृत का, सनातन धर्म का और परम आनंद का आधार मैं ही हूँ।
