Bhajan Dhun Bhajan Dhun Bhakti. Har Din. Har Ghar.
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अध्याय १३ · 35 श्लोक

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

शरीर क्षेत्र है और उसे जानने वाला क्षेत्रज्ञ। ज्ञान के लक्षण, जानने योग्य परमात्मा, और प्रकृति-पुरुष का भेद इस अध्याय के विषय हैं।

यह हिन्दी भावार्थ Bhajan Dhun ने नया लिखा है और विद्वानों द्वारा इसकी समीक्षा अभी जारी है।

  1. 13.1

    अर्जुन उवाच

    प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
    एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥१३.१॥

    अर्जुन बोले — हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और जानने योग्य (ज्ञेय) — इन सबके बारे में जानना चाहता हूँ।

  2. 13.2

    श्री भगवानुवाच

    इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
    एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥१३.२॥

    श्रीभगवान बोले — हे कौन्तेय! यह शरीर "क्षेत्र" कहलाता है, और जो इसे जानता है, उसे तत्त्व जानने वाले "क्षेत्रज्ञ" कहते हैं।

  3. 13.3

    क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
    क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥१३.३॥

    हे भारत! सब क्षेत्रों (शरीरों) में क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में सच्चा ज्ञान है।

  4. 13.4

    तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ।
    स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु ॥१३.४॥

    वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, उसमें कौन-से विकार हैं, वह किससे उत्पन्न हुआ है, और वह क्षेत्रज्ञ कौन है और उसका क्या प्रभाव है — यह संक्षेप में मुझसे सुनो।

  5. 13.5

    ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
    ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥१३.५॥

    इसे ऋषियों ने अनेक प्रकार से, वेदों के अलग-अलग छंदों में गाया है, और तर्क से युक्त, निश्चित ब्रह्मसूत्र के पदों में भी बताया है।

  6. 13.6

    महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
    इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥१३.६॥

    पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (मूल प्रकृति), दस इन्द्रियाँ, एक मन और इन्द्रियों के पाँच विषय —

  7. 13.7

    इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
    एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥१३.७॥

    इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, शरीर का समूह, चेतना और धैर्य — यह विकारों सहित क्षेत्र संक्षेप में बताया गया है।

  8. 13.8

    अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
    आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥१३.८॥

    अपने को बड़ा न मानना, दिखावा न करना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, पवित्रता, स्थिरता और मन का संयम —

  9. 13.9

    इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।
    जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥१३.९॥

    इन्द्रियों के विषयों से वैराग्य, अहंकार का न होना, और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, रोग और दुख में दोष को बार-बार देखना —

  10. 13.10

    असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
    नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥१३.१०॥

    पुत्र, पत्नी, घर आदि में आसक्ति और अत्यधिक लगाव का न होना, और अच्छी-बुरी परिस्थितियों में सदा मन का समान रहना —

  11. 13.11

    मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
    विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥१३.११॥

    मुझमें अनन्य योग से अटल भक्ति, एकांत स्थान में रहना और भीड़-भाड़ में रुचि न होना —

  12. 13.12

    अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
    एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥१३.१२॥

    अध्यात्म-ज्ञान में सदा लगे रहना और तत्त्व-ज्ञान के लक्ष्य (परमात्मा) को देखना — यह सब ज्ञान कहलाता है, और जो इससे उलटा है वह अज्ञान है।

  13. 13.13

    ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ।
    अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥१३.१३॥

    अब मैं वह बताऊँगा जो जानने योग्य है, जिसे जानकर मनुष्य अमरता पाता है। वह अनादि परम ब्रह्म है, जिसे न सत् कहा जा सकता है, न असत्।

  14. 13.14

    सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
    सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥१३.१४॥

    उसके हाथ-पैर सब ओर हैं, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, कान सब ओर हैं; वह संसार में सबको ढककर (व्याप्त होकर) स्थित है।

  15. 13.15

    सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
    असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥१३.१५॥

    वह सब इन्द्रियों के गुणों को प्रकाशित करता है, पर स्वयं सब इन्द्रियों से रहित है। वह आसक्ति-रहित होकर भी सबका पालन करता है, और गुणों से परे होकर भी गुणों का भोक्ता है।

  16. 13.16

    बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
    सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥१३.१६॥

    वह सब प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी, अचल भी है और चल भी। सूक्ष्म होने के कारण वह जाना नहीं जा सकता; वह दूर भी है और पास भी।

  17. 13.17

    अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
    भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥१३.१७॥

    वह अविभाज्य होकर भी प्राणियों में बँटा हुआ-सा दिखता है। उसे प्राणियों का पालन करने वाला, संहार करने वाला और उत्पन्न करने वाला जानना चाहिए।

  18. 13.18

    ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
    ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥१३.१८॥

    वह सब ज्योतियों की भी ज्योति है और अंधकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञान है, जानने योग्य है, ज्ञान से प्राप्त होने वाला है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।

  19. 13.19

    इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
    मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥१३.१९॥

    इस तरह क्षेत्र, ज्ञान और जानने योग्य (ज्ञेय) को संक्षेप में बताया गया। मेरा भक्त इसे जानकर मेरे भाव को प्राप्त होता है।

  20. 13.20

    प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
    विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥१३.२०॥

    प्रकृति और पुरुष दोनों को अनादि जानो, और विकारों और गुणों को प्रकृति से उत्पन्न जानो।

  21. 13.21

    कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
    पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥१३.२१॥

    कार्य (शरीर) और कारण (इन्द्रियाँ) को उत्पन्न करने में प्रकृति कारण कही जाती है, और सुख-दुख के भोगने में पुरुष (जीवात्मा) कारण कहा जाता है।

  22. 13.22

    पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
    कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥१३.२२॥

    प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है, और गुणों से आसक्ति ही उसके अच्छी-बुरी योनियों में जन्म का कारण है।

  23. 13.23

    उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
    परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥१३.२३॥

    इस शरीर में स्थित परम पुरुष साक्षी, अनुमति देने वाला, पालन करने वाला, भोक्ता और महेश्वर है; उसे परमात्मा भी कहा जाता है।

  24. 13.24

    य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
    सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥१३.२४॥

    जो पुरुष को और गुणों सहित प्रकृति को इस तरह जानता है, वह हर तरह से बरतता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता।

  25. 13.25

    ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
    अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥१३.२५॥

    कुछ लोग ध्यान के द्वारा अपने भीतर, अपने आप से आत्मा को देखते हैं; कुछ सांख्य-योग (ज्ञान) से और कुछ कर्मयोग से।

  26. 13.26

    अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते ।
    तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥१३.२६॥

    कुछ लोग इस तरह न जानते हुए दूसरों से सुनकर उपासना करते हैं। सुने हुए को ही परम मानने वाले वे लोग भी मृत्यु को पार कर जाते हैं।

  27. 13.27

    यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
    क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥१३.२७॥

    हे भरतश्रेष्ठ! जो कुछ भी चर या अचर प्राणी उत्पन्न होता है, उसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुआ जानो।

  28. 13.28

    समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
    विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥१३.२८॥

    जो सब नाशवान प्राणियों में अविनाशी परमेश्वर को समान रूप से स्थित देखता है, वही सही देखता है।

  29. 13.29

    समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
    न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम् ॥१३.२९॥

    जो सब जगह समान रूप से स्थित ईश्वर को समान देखता है, वह अपने द्वारा अपना नाश नहीं करता, और इसलिए परम गति पाता है।

  30. 13.30

    प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
    यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति ॥१३.३०॥

    जो देखता है कि सब कर्म प्रकृति के द्वारा ही किए जा रहे हैं और आत्मा अकर्ता है, वही सही देखता है।

  31. 13.31

    यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
    तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥१३.३१॥

    जब वह प्राणियों के अलग-अलग भावों को एक परमात्मा में स्थित और उसी से फैलता हुआ देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

  32. 13.32

    अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
    शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥१३.३२॥

    हे कौन्तेय! अनादि और गुणों से परे होने के कारण यह अविनाशी परमात्मा शरीर में रहते हुए भी न कुछ करता है, न किसी से लिप्त होता है।

  33. 13.33

    यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
    सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते ॥१३.३३॥

    जैसे सब जगह फैला हुआ आकाश सूक्ष्म होने के कारण किसी से लिप्त नहीं होता, वैसे ही शरीर में सब जगह स्थित आत्मा लिप्त नहीं होती।

  34. 13.34

    यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
    क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥१३.३४॥

    हे भारत! जैसे एक ही सूर्य इस पूरे संसार को प्रकाशित करता है, वैसे ही क्षेत्री (आत्मा) पूरे क्षेत्र (शरीर) को प्रकाशित करता है।

  35. 13.35

    क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
    भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥१३.३५॥

    जो ज्ञान की आँखों से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के इस भेद को और प्रकृति से प्राणियों की मुक्ति (के उपाय) को जानते हैं, वे परम पद को प्राप्त होते हैं।