Bhajan Dhun Bhajan Dhun Bhakti. Har Din. Har Ghar.
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अध्याय ९ · 34 श्लोक

राजविद्याराजगुह्ययोग

यह सबसे गोपनीय और सरल ज्ञान है। भगवान कहते हैं कि प्रेम से अर्पित एक पत्ता, फूल, फल या जल भी वे स्वीकार करते हैं, और उनका भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

यह हिन्दी भावार्थ Bhajan Dhun ने नया लिखा है और विद्वानों द्वारा इसकी समीक्षा अभी जारी है।

  1. 9.1

    श्री भगवानुवाच

    इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
    ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥९.१॥

    श्रीभगवान बोले — तुम दोष-दृष्टि नहीं रखते, इसलिए मैं तुम्हें यह सबसे गोपनीय ज्ञान अनुभव सहित बताऊँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (संसार के बंधन) से मुक्त हो जाओगे।

  2. 9.2

    राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
    प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥९.२॥

    यह सब विद्याओं का राजा, सब रहस्यों का राजा, बहुत पवित्र और उत्तम है। इसका अनुभव प्रत्यक्ष होता है, यह धर्म के अनुकूल है, करने में बहुत सरल है और अविनाशी है।

  3. 9.3

    अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
    अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥९.३॥

    हे परन्तप! इस धर्म में श्रद्धा न रखने वाले लोग मुझे न पाकर मृत्यु-रूपी संसार के मार्ग में लौटते रहते हैं।

  4. 9.4

    मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
    मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥९.४॥

    मेरे अव्यक्त (निराकार) रूप से यह सारा जगत व्याप्त है। सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, पर मैं उनमें (सीमित होकर) स्थित नहीं हूँ।

  5. 9.5

    न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
    भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥९.५॥

    और फिर भी प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं — मेरी इस ईश्वरीय योग-शक्ति को देखो! मैं प्राणियों को धारण और उत्पन्न करता हूँ, फिर भी मेरा स्वरूप उनमें बँधा नहीं है।

  6. 9.6

    यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
    तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥९.६॥

    जैसे सब जगह चलने वाली विशाल वायु सदा आकाश में ही स्थित रहती है, वैसे ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं — ऐसा समझो।

  7. 9.7

    सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
    कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥९.७॥

    हे कौन्तेय! कल्प के अंत में सब प्राणी मेरी प्रकृति में विलीन हो जाते हैं, और कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें फिर से रचता हूँ।

  8. 9.8

    प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
    भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥९.८॥

    अपनी प्रकृति को वश में रखकर मैं प्रकृति के अधीन इस पूरे प्राणी-समूह को बार-बार रचता हूँ।

  9. 9.9

    न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।
    उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥९.९॥

    हे धनंजय! वे कर्म मुझे नहीं बाँधते, क्योंकि मैं उन कर्मों में आसक्ति के बिना, एक उदासीन (तटस्थ) की तरह स्थित रहता हूँ।

  10. 9.10

    मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
    हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥९.१०॥

    हे कौन्तेय! मेरी देख-रेख में प्रकृति चर-अचर सहित इस जगत को उत्पन्न करती है, और इसी कारण यह संसार चक्र की तरह घूमता रहता है।

  11. 9.11

    अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
    परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥९.११॥

    मूढ़ लोग मनुष्य-शरीर धारण किए हुए मेरे उस परम भाव को नहीं जानते कि मैं सब प्राणियों का महान ईश्वर हूँ, और इसलिए मेरा अनादर करते हैं।

  12. 9.12

    मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
    राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥९.१२॥

    ऐसे विवेकहीन लोगों की आशाएँ, कर्म और ज्ञान सब व्यर्थ होते हैं; वे मोह में डालने वाले राक्षसी और आसुरी स्वभाव का सहारा लेते हैं।

  13. 9.13

    महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
    भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥९.१३॥

    पर हे पार्थ! दैवी स्वभाव वाले महात्मा मुझे सब प्राणियों का आदि और अविनाशी जानकर अनन्य मन से मुझे भजते हैं।

  14. 9.14

    सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
    नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥९.१४॥

    वे दृढ़ व्रत वाले भक्त सदा मेरा कीर्तन करते हुए, प्रयत्न करते हुए और भक्ति से मुझे प्रणाम करते हुए, निरंतर मुझमें लगे रहकर मेरी उपासना करते हैं।

  15. 9.15

    ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
    एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥९.१५॥

    दूसरे लोग ज्ञान-यज्ञ से मेरी पूजा करते हैं — कोई मुझे एक (अभेद) रूप में, कोई अलग रूप में, और कोई अनेक रूपों में सब ओर मुख वाले विराट रूप में।

  16. 9.16

    अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् ।
    मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥९.१६॥

    मैं क्रतु (वैदिक अनुष्ठान) हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं पितरों को दिया जाने वाला अन्न (स्वधा) हूँ, मैं औषधि हूँ, मैं मंत्र हूँ, मैं घी हूँ, मैं अग्नि हूँ और मैं ही आहुति हूँ।

  17. 9.17

    पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
    वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च ॥९.१७॥

    मैं इस जगत का पिता, माता, धारण करने वाला और पितामह हूँ। जानने योग्य, पवित्र ओंकार और ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।

  18. 9.18

    गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
    प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥९.१८॥

    मैं ही लक्ष्य, पालनहार, स्वामी, साक्षी, निवास, शरण और सच्चा मित्र हूँ; उत्पत्ति, प्रलय, आधार, भंडार और अविनाशी बीज भी मैं हूँ।

  19. 9.19

    तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
    अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥९.१९॥

    हे अर्जुन! मैं ही सूर्य बनकर तपता हूँ, वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। अमृत और मृत्यु, सत् और असत् भी मैं ही हूँ।

  20. 9.20

    त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
    ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥९.२०॥

    तीनों वेदों के कर्मकाण्ड को करने वाले, सोमरस पीकर पापों से शुद्ध हुए लोग यज्ञों से मेरी पूजा करके स्वर्ग जाने की प्रार्थना करते हैं। वे पुण्य के फल से इन्द्रलोक पाकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं।

  21. 9.21

    ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
    एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥९.२१॥

    वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्य समाप्त होने पर फिर मृत्युलोक में आ जाते हैं। इस तरह वेदों के सकाम कर्मकाण्ड का सहारा लेने वाले भोगों की कामना करने वाले लोग बार-बार आते-जाते रहते हैं।

  22. 9.22

    अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
    तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥९.२२॥

    जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन सदा मुझमें लगे भक्तों के योग (जो नहीं है उसे देना) और क्षेम (जो है उसकी रक्षा) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।

  23. 9.23

    येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।
    तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥९.२३॥

    हे कौन्तेय! जो भक्त श्रद्धा से दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी वास्तव में मुझे ही पूजते हैं, पर शास्त्र की सही विधि के बिना।

  24. 9.24

    अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
    न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥९.२४॥

    क्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ। पर वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते, इसलिए गिर जाते हैं (पुनर्जन्म पाते हैं)।

  25. 9.25

    यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृव्रताः ।
    भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥९.२५॥

    देवताओं को पूजने वाले देवताओं को पाते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को, भूतों को पूजने वाले भूतों को, और मेरी पूजा करने वाले मुझे ही पाते हैं।

  26. 9.26

    पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
    तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥९.२६॥

    जो मुझे प्रेम से एक पत्ता, फूल, फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्ध मन वाले भक्त की प्रेम से दी हुई वह भेंट मैं स्वीकार करता हूँ।

  27. 9.27

    यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
    यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥९.२७॥

    हे कौन्तेय! तुम जो कुछ करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो दान देते हो और जो तप करते हो — वह सब मुझे अर्पित कर दो।

  28. 9.28

    शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
    संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥९.२८॥

    इस तरह तुम शुभ और अशुभ फल देने वाले कर्म-बंधनों से छूट जाओगे, और संन्यास-योग से युक्त मन वाले होकर मुक्त होकर मुझे प्राप्त होगे।

  29. 9.29

    समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
    ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥९.२९॥

    मैं सब प्राणियों में समान हूँ; न कोई मेरा द्वेषी है, न विशेष प्रिय। पर जो भक्ति से मुझे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।

  30. 9.30

    अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
    साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥९.३०॥

    यदि कोई बहुत बुरे आचरण वाला व्यक्ति भी अनन्य भाव से मुझे भजता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसने सही निश्चय कर लिया है।

  31. 9.31

    क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
    कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥९.३१॥

    वह जल्दी ही धर्मात्मा बन जाता है और सदा रहने वाली शांति पाता है। हे कौन्तेय! निश्चय जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

  32. 9.32

    मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
    स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥९.३२॥

    हे पार्थ! जो पाप-योनि वाले माने जाते हैं, और स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र भी — मेरी शरण लेकर वे सभी परम गति को प्राप्त होते हैं।

  33. 9.33

    किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
    अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥९.३३॥

    फिर पुण्यात्मा ब्राह्मणों और भक्त राजर्षियों की तो बात ही क्या! इसलिए इस अस्थायी और दुखभरे संसार में आकर मुझे भजो।

  34. 9.34

    मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
    मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥९.३४॥

    मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे नमस्कार करो। इस तरह अपने को मुझमें लगाकर, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर तुम मुझे ही प्राप्त होगे।